Friday, 17 July 2020

बहुवचन के विभिन्न रूपो का अभ्यास, बहुवचन के रूप,


बहुवचन का अभ्यास-

         दिए   गए शब्द के उचित बहुवचन रूप का प्रयोग करते हुए रिक्‍त स्थानों की पूर्ति कीजिए
१)      ग्रामवासी
अ)    गाँव में कई _________ रहते थे।
आ)  सभी _____________ को राजा ने अपने दरबार में बुलाया।

२)      राजा-
अ)    सभी ________ अपनी प्रजा के भले की सोचते हैं।
आ)   कुछ _________ ने स्वयं प्रजा के साथ मिलकर काम किया।

३)      हाथी-
अ)    ________ का झुंड सड़क पर आ गया था।
आ)  बहुत सारे __________ सर्कस में काम करते थे।

४)     कमरा-
अ)    इस घर में पाँच _____ हैं।
आ)  सभी _________ के रंग अलग-अलग हैं।

५)     चटाई
अ)    यहाँ पर तरह-तरह की ____________ हैं।
आ)   कुछ ___________ पर बने फूल मुझे अच्छे लगे।


Sunday, 28 June 2020

हम पंछी उन्मुक्त गगन के (शिवमंगल सिंह सुमन) व्याख्या, अर्थ, भावार्थ


हम पंछी उन्मुक्त गगन के (शिवमंगल सिंह सुमन)
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाएँगे।
व्याख्या- इस कविता में कवि ने स्वतंत्रता का महत्‍त्व एक पंछी के माध्यम से बताने की कोशिश की है। वे कहते हैं कि पंछी का सामान्य गुण पंख फैलाकर खुले आसमान में उड़ने का है वे पिंजरे में बंद होकर प्रसन्‍न नहीं हो सकते। चाहे वह पिंजरा सोने का ही क्यों न हो अर्थात वहाँ चाहे कितनी भी सुख-सुविधाएँ हों। पिंजरे की तीलियों से टकराकर उसके पंख टूट जाएँगे।
हम बहता जल पीने वाले
मर जाएँगे भूखे-प्यासे,
कहीं भली है कटुक निबौरी
कनक – कटोरी की मैदा से
व्याख्या- पंछी के माध्यम से कवि कहते हैं कि हम तो नदी का बहता जल पीने वाले है। पिंजरे में आसानी से उपलब्ध दाना-पानी से ज़्यादा नीम की कड़वी निबौरियाँ (नीम के फल) पसंद हैं। अर्थात पंछी को आज़ाद रहकर भूखा-प्यासा रहना अधिक पसंद है न कि पिंजरे में रहकर किसी की गुलामी करना।(कैद में मिल रही सुख-सुविधाओं से ज़्यादा  अच्छा संघर्षरत स्वछंद जीवन होता है।)
स्वर्ण -शृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले,
बस सपनों में देख रहे हैं
तरु की फुनगी पर के झूले।
            ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नीले नभ की सीमा पाने,
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने।
व्याख्या- कविता में पंछी कहता है कि सोने के पिंजरे में कैद होने पर हम अपनी स्वच्छंदता, उड़ान सब भूल गए हैं। अब तो पेड़ की ऊँची डालियों में मस्त होकर झूलने का सपना ही मात्र रह गया है। हमारी चाह थी कि हम उड़ते हुए इस आसमान की सीमा नाप लेंगे और आसमान में बिखरे अनार के दाने रूपी तारों  सूरज के समान अपनी चोंच से चुग लेंगे। अर्थात उन तक पहुँच जाएँगे परंतु अब तो पिंजरे में कैद होकर यह तो मात्र कल्पना ही है।
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी।
            नीड़ न दो चाहे टहनी का
            आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो,
            लेकिन पंख दिए  हैं तो
            आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालो।
व्याख्या- पंछी कहता है कि आज़ाद होकर हम उड़ते –उड़ते क्षितिज (जहाँ धरती और आसमान मिलते हुए प्रतीत होते हैं। )से होड़ लगाना चाहते थे। इस दौड़ में या प्रतिस्पर्धा में या तो हम क्षितिज को पा लेते या हम थक कर चूर हो जाते या मर जाते।
वे सभी से निवेदन करते हैं कि चाहे हमारे घोंसलों को तोड़ दो, कोई अन्य सुविधा भी मत दो पर यदि पंख दिए हैं तो हमें स्वतंत्र होकर उड़ने दो उसमें कोई बाधा न डालो।
विशेष-जिस प्रकार पंछी  सभी सुखों को त्याग कर स्वतंत्र होकर उड़ना चाहता है उसी प्रकार हम सभी किसी तरह की गुलामी और कैद नहीं चाहते हम आज़ाद होकर आगे बढ़ना चाहते हैं।

Thursday, 18 June 2020

informal letter format, अनौपचारिक पत्र का प्रारूप,



अनौपचारिक पत्र का प्रारूप

_______________,
_______________,                        अपना पता
_______________
लाइन छोड़े-------------------

दिनांक  (१५ जून २०२०)

लाइन छोड़े-------------------

आदरणीय/ प्रिय रिश्ता/ नाम,(मित्र/छोटे भाई -बहन के लिए)
प्रणाम/ नमस्ते
मैं यहाँ कुशल मंगल हूँ। आशा करती/ करता हूँ कि आप भी वहाँ कुशल मंगल होंगे। __  __ __  ___________   __________।
________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________।
_________________________________________________________________ अपने माता-पिता को मेरा प्रणाम कहना और छोटे भाई को मेरा प्यार देना।

लाइन छोड़े-------------------

आपका पुत्र/ भाई/ मित्र,
क, ख,ग(अपना नाम)

लाइन छोड़े-------------------

 ________________,
________________,                       जिसे पत्र भेजा जा रहा है उसका पता
________________ ।                              (receiver’s address)

Saturday, 6 June 2020

ऑन लाइन शिक्षण और ऑफ़ लाइन शिक्षक


बड़ा सुहाना मौसम है आज! आज है जून का पहला रविवार। चौंकिए नहीं ये कोई खास अवसर वाला  पहला, दूसरा, तीसरा...... जैसा रविवार नहीं है और न ही कोई भारतीय त्योहार, जिसके भूल जाने का अफ़सोस हो । यदि ऐसा है भी तो मेरे ज्ञान क्षेत्र के दायरे से बाहर है।आज का दिन खास है क्योंकि यह कोविड-१९ की एक महान देन है। आप सबका इससे कहीं न कहीं वास्ता ज़रूर पड़ा होगा। यह है-ऑनलाइन संस्कृति।
कोविड -१९ महामारी के भयंकर दौर में देश का पालनहार , तारण हार बने ऑन लाइन संस्कृति ने तो जैसे धूम ही मचा दी .... पर कहाँ??? या ये कहें कि भोले-भाले देशवासियों की गले की फ़ाँस बन गया। ई-पास, प्लास्टिक मनी और पता नहीं क्या-क्या जिसकी ज़्यादातर लोगों ने कल्पना भी न की थी वैसे सभी काम उस देश में जहाँ अब भी ७०% जनसंख्या या तो गाँवो में है या महानगरों की झोपड़ पट्‍टियों में। मतलब साफ़ है उन्होंने ऐसी कोई शैक्षिक योग्यता हासिल नहीं की जो इन्हें इस तरह के लेन-देन में पारंगत करती हो। ये तो है इसकी बड़ी विसंगति..
पर जिस दिलचस्प बात को लेकर मैंने यह लेखन आरंभ किया था वह तो मामूली सी दिखने वाली बड़ी बात में दबी जा रही है।हाँ जी तो मैं बात करना चाहती हूँ हमारे देश के नौ निहालो, भावी भविष्य के प्रवर्तक हमारे बच्‍चों और मौजूदा शिक्षा प्रणाली पर। वर्तमान समय में ऑनलाइन संस्कृति का सर्वाधिक उपभोग करने वाले और नौसिखिया कौम हमारे बच्‍चे जिनको कुछ समय पहले तक एक-एक मिनट के लिए कम्प्यूटर और मोबाइल के लिए न जाने कितनी मिन्‍नतें और गुहार लगानी पड़ती थी। और उन्हें इनसे दूर रखने के लिए इसके दुष्‍परिणामों पर न जाने कितने शोध कर्ता, अन्वेषक, चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और अभिभावकों ने अपने जीवन के कीमती पल हवन कर दिए।
कहते हैं न दिन तो सबके फिरते हैं तो अब वही एक-एक पल के स्क्रीन टाइम को तरसते बच्‍चे बैठते हैं पाँच से  आठ घंटो तक उस चमकदार चकाचौंध कर देने वाले मोबाइल और कम्प्यूटर के सामने। कुछ उत्साह से कुछ बेचारगी में। ये मध्यम वर्गीय और उच्च वर्गीय, निजी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ने वाले शहरी और कस्बाई बच्‍चों ने इस शिक्षा जगत की नाव खेने का बीड़ा-सा उठा रखा है।
उनकी इस नाव को पार उतरवाने का उत्तरदायित्व जिन कंधों पर है वह है आज का शिक्षक। बच्चे तो अभी बच्चे हैं , कच्‍ची माटी जिस आकार में ढालोगे ढल जाएँगे पर इन रूढ़ हो चुके शिक्षकों के मस्तिष्‍क का क्या? ये बात सही होगी कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती पर क्या यह सब पर लागू होती है?? इन्हीं सवालों को नकारता यह शिक्षक बढ़ा जा रहा है आगे ’कैरट और स्टिक’ की थ्योरी को सत्य करता, या मरता क्या न करता की कहावत को सिद्‍ध करता। तो जनाब पिछले कई हफ़्तों से यह ऑन लाइन की जद्‍दोजहद चालू है और विश्‍वास मानिए काम का इतना दबाव शायद मैंने एक शिक्षिका ने कभी महसूस नहीं किया कि मुझे इस इतवार को ऐसा एहसास हुआ जैसे पंद्रहों की दिवाली की सफ़ाई के बाद अंत में आपको दिए जलाने और मिठाई खाने का अवसर मिला हो।
पर अभी तो पार्टी शुरू हुई है!! अभी तो मंज़िल बहुत दूर नज़र आती है। उस पर व्हाट्‍स ऐप और फ़ेसबुक पर आती पोस्ट- स्कूल बंद कर दो, भाई इस अदना से शिक्षक का भी योगदान है भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ किसी पढ़े लिखे बेरोजगार का अंतिम कैरियर ऑप्शन शिक्षक बनने का होता है जिससे वह किसी तरह अपना पेट पाल सके या फ़िर महिलाओं को अपने ऊपरी खर्चों के अर्जन बावत मिल रही सांत्वना राशि जितना वेतन ।
इतनी परेशानियों के चलते इन लौह-पुरुषों ने ऑन-लाइन शिक्षण रूपी तालाब में हाथ-पाँव मारने शुरु कर दिए है।ये हर संभव प्रयास करते हैं अपनी परेशानियों को दरकिनार कर नए-नए प्रयोग करने की, तकनीकियों को जानने की और अपने विद्‍यार्थियों के नावों को पार लगाने की। भला हो इस ऑन लाइन संस्कृति का जिसकी कृत्रिम बुद्‍धिमत्‍ता ने इस सर्व विजयी मानव की प्राकृतिक बुद्‍धिमत्‍ता को मात दे रखी है। पर इस क्षेत्र के पंडितों के अनुसार अभी तो यह शुरुआत है अभी इस महामस्तिष्‍क का अलौकिक रूप देखना बाकी है।
अतएव इन्हीं सभी कारणों से यह जून का पहला रविवार अविस्मरणीय और चरम सुख की अनुभूति कराता है और मुझे एक शिक्षिका को यह बता जाता है कि कल सोमवार है और फ़िर कुछ नया देखने और सीखने को है....... सदा सीखते रहो...

Sunday, 19 January 2020

kavita murajhaya phool


qÉÑUfÉÉrÉÉ TÔüsÉ 

oÉÌaÉrÉÉ qÉåÇ mÉåÄQû Måü lÉÏcÉå mÉÄQûÉ

qÉÑUfÉÉrÉÉ TÔüsÉ

ZÉÑzÉoÉÔ xÉå pÉUÉ, MüÐcÉÄQû xÉå xÉlÉÉ,

qÉÑUfÉÉrÉÉ TÔüsÉ

UÉåiÉÉ Wæû AmÉlÉÏ ÌMüxqÉiÉ mÉU,

iÉUxÉ ZÉÉiÉÉ Wæû ZÉÑS mÉU

uÉWû xÉWûqÉÉ xÉÉ, QûUÉ xÉÉ mÉÄQûÉ Wæû

YrÉÉåÇÌMü,

MüÉåD lÉWûÏÇ AmÉlÉÉLaÉÉ ExÉå,

MÑücÉsÉ eÉÉLaÉÉ ÌMüxÉÏ AÉæU Måü mÉæUÉåÇ iÉsÉå,

ÄTåüMü ÌSrÉÉ eÉÉLaÉÉ MücÉUå qÉåÇ MüWûÏÇ....

ÍqÉOû eÉÉLaÉÉ ExÉMüÉ AÎxiÉiuÉ uÉWûÏÇ....

mÉU rÉÌS uÉWû uÉWûÏÇ UWûÉ ÍqÉOèOûÏ qÉåÇ ÍqÉsÉ aÉrÉÉ

iÉÉå ExÉÏ qÉÑUfÉÉL TÔüsÉ MüÐ ZÉÑzÉoÉÔ

SåaÉÏ ÍqÉOèOûÏ MüÉå iÉÉMüiÉ

ExÉMåü eÉæxÉå lÉ eÉÉlÉå ÌMüiÉlÉå WûÏ TÔüsÉ qÉWûMåÇüaÉå

ExÉ ÍqÉOèOûÏ qÉåÇ

eÉWûÉð ÍqÉsÉ aÉrÉÉ jÉÉ

uÉWû qÉÑUfÉÉrÉÉ TÔüsÉ

                        UcÉlÉÉ ÍqÉ´ÉÉ

__________ 

Thursday, 7 November 2019

'ki' aur 'kee' me antar




कि’ और ’की’ में अंतर-

 

कि

की

१.        

’कि’ एक योजक शब्द है, अर्थात दो वाक्यों को जोड़ता है।

जैसे – उसने कहा था कि वह घर पर मिलेगा।

’की’ एक संबंध कारक है जो वाक्य में दो शब्दों में संबंध बताता है

जैसे – राधा की किताब गुम गई है।

२.        

’कि’ के पहले क्रिया शब्द आता है।

’की’ के पहले संज्ञा या सर्वनाम शब्द आते हैं।

३.        

’कि’ के बाद संज्ञा या सर्वनाम शब्द आते हैं।

’ की ’ के बाद स्त्रीलिंग संज्ञा शब्द आते हैं।

४.       

अन्य शब्दों से मिलकर दूसरे योजक शब्द जैसे जबकि, क्योंकि, हालांकि, ताकि आदि बनाता है।

’की’ सर्वनाम शब्दों से मिलकर आपकी, सबकी, उनकी, किनकी, किसकी आदि शब्द बनाते हैं।

दो वस्तुओं मेम किसी एक का चुनाव करने के लिए भी ’ कि’ का प्रयोग होता है। जैसे आम लोगे कि केला   या चाय पियोगे कि कॉफ़ी

’की’ का प्रयोग भूतकाल की क्रिया के रूप में भी होता है।

जैसे- राम ने लंका में चढ़ाई की।

Saturday, 10 November 2018

surdas ka jeevaparichay in brief


xÉÔUSÉxÉ

xÉÔUSÉxÉ pÉÎYiÉ rÉÑaÉ Måü mÉëqÉÑZÉ MüÌuÉ WæÇû| rÉå xÉaÉÑhÉ pÉÎYiÉ kÉÉUÉ Måü M×üwhÉ pÉÎYiÉ MüÉurÉ mÉUÇmÉUÉ Måü mÉëqÉÑZÉ MüÌuÉrÉÉåÇ qÉåÇ xÉå LMü WæÇû|  xÉÔU pÉYiÉ MüÌuÉ AÉæU M×üwhÉ Måü EmÉÉxÉMü jÉåû| M×üwhÉ Måü mÉëÌiÉ ElÉMüÐ pÉÎYiÉ mÉëåqÉ xÉå pÉUÏ jÉÏ| xÉÔUSÉxÉ lÉå AmÉlÉå MüÉurÉ qÉåÇ AmÉlÉå AUÉkrÉ Måü mÉëÌiÉ mÉëåqÉ mÉëMüOû MüUlÉå Måü ÍsÉL ElÉMåü ÃmÉ, UÇaÉ, urÉÎYiÉiuÉ, mÉËUuÉåzÉ, Ì¢ürÉÉ-MüsÉÉmÉ, sÉÏsÉÉ, AÉÌS  MüÉ ÍcɧÉhÉ xÉWûeÉ ÃmÉ xÉå ÌMürÉÉ Wæû|

ÌuÉÍpÉllÉ ÌuɲÉlÉÉåÇ Måü qÉiÉÉlÉÑxÉÉU xÉÔUSÉxÉ MüÉ eÉlqÉ 1478 D. qÉåÇ WÒûAÉ| eÉlqÉ xjÉÉlÉ qÉjÉÑUÉ AÉæU AÉaÉUÉ Måü oÉÏcÉ aÉFbÉÉOû  rÉÉ xÉÏWûÏ lÉÉqÉMü xjÉÉlÉ oÉiÉÉrÉÉ eÉÉiÉÉ Wæû| ElÉMüÐ qÉ×irÉÑ MüÐ ÌiÉÍjÉ MüÉ AlÉÑqÉÉlÉ  1581 xÉå 1584 Måü oÉÏcÉ sÉaÉÉrÉÉ eÉÉiÉÉ Wæû| rɱÌmÉ rÉå xÉqÉrÉ ÌlÉÎzcÉiÉ lÉWûÏÇ WæÇû| xÉÔUSÉxÉ eÉlqÉ xÉå WûÏ AÇkÉå jÉå AÉæU NûWû xÉÉsÉ MüÐ EqÉë qÉåÇ bÉU NûÉåÄQûMüU oÉëeÉ qÉåÇ UWûlÉå sÉaÉå| rÉWûÏÇ ElÉMüÐ qÉÑsÉÉMüÉiÉ (pÉåÇOû)xuÉÉqÉÏ uÉssÉpÉÉcÉÉrÉï xÉå WÒûD|

ExÉ xÉqÉrÉ eÉoÉ SåzÉ qÉåÇ UÉeÉlÉÏÌiÉMü EjÉsÉ-mÉÑjÉsÉ qÉcÉÏ jÉÏ iÉoÉ pÉÎYiÉMüÉsÉ Måü MüÌuÉrÉÉåÇ lÉå SåzÉ Måü xÉÉqÉÉlrÉ eÉlÉ MüÉå lÉD ÌSzÉÉ SålÉå qÉåÇ qÉWû¨uÉmÉÔhÉï pÉÔÍqÉMüÉ ÌlÉpÉÉD jÉÏÌlÉlÉ MüÌuÉrÉÉåÇ lÉå eÉlÉ pÉÉwÉÉAÉåÇ(AÉqÉ sÉÉåaÉÉåÇ MüÐ pÉÉwÉÉ) MüÉå AmÉlÉå MüÉurÉ MüÉ AÉkÉÉU oÉlÉÉrÉÉ| xÉÔUSÉxÉ pÉÏ CxÉÏ mÉUÇmÉUÉ qÉåÇ AÉaÉå oÉÄRåû|  ElWûÉåÇlÉå LMü AÉkÉÑÌlÉMü ÌWûlSÏ pÉÉwÉÉoÉëeÉpÉÉwÉÉ MüÉ mÉërÉÉåaÉ AmÉlÉå MüÉurÉ qÉåÇ ÌMürÉÉ| ElÉMüÐ UcÉlÉÉLÆ AÉqÉ pÉÉwÉÉ qÉåÇ jÉÏ, ElÉqÉåÇ aÉårÉiÉÉ jÉÏ, oÉëeÉpÉÉwÉÉ MüÐ sÉÉåMüxÉÇxM×üÌiÉ MüÉ xÉqÉÉuÉåzÉ jÉÉ iÉjÉÉ ÌuÉÍpÉllÉ UxÉÉåÇ Måü mÉërÉÉåaÉ lÉå CÌiÉWûÉxÉ qÉåÇ ElWåÇû ÌuÉÍzÉwOû xjÉÉlÉ mÉëSÉlÉ ÌMürÉÉ Wæû|

xÉÔUSÉxÉ lÉå SÉåWûÉ, UÉåsÉÉ, xÉÉåUPûÉ, cÉÉæmÉÉD, xÉuÉærrÉÉ, MüÌuɨqÉ MÑÇüQûÍsÉrÉÉð AÉÌS MüÉ mÉërÉÉåaÉ xuÉcNÇûS ÃmÉ xÉå ÌMürÉÉ Wæû|

xÉÔUxÉÉaÉUClÉMüÐ LMü mÉëqÉÑZÉ UcÉlÉÉ Wæû| ÎeÉlÉMüÉå MÑüNû ÌuÉSèuÉÉlÉ qÉWûÉMüÉurÉ MüÉ SeÉÉï pÉÏ SåiÉå WæûÇ AÉæU MÑüNû CxÉå aÉÏiÉÉiqÉMü qÉWûÉMüÉurÉ MüWûiÉå WæÇû|

sÉÏsÉÉ¢üqÉ Måü AlÉÑxÉÉU xÉÔUxÉÉaÉU MüÉå xÉÉiÉ pÉÉaÉÉåÇ qÉåÇ oÉÉðOûÉ aÉrÉÉ Wæû- 1. ÌuÉlÉrÉ Måü mÉS, 2. oÉÉsÉsÉÏsÉÉ, 3. uÉ×lSÉuÉlÉ sÉÏsÉÉ, 4. qÉÉkÉÑrÉï sÉÏsÉÉ, 5. qÉjÉÑUÉsÉÏsÉÉ. 6. SèuÉÉËUMüÉ sÉÏsÉÉ AÉæU  7. AuÉiÉÉU sÉÏsÉÉ

xÉÔUSÉxÉ MüÐ ZrÉÉÌiÉ aÉÏiÉMüÉU Måü ÃmÉ qÉåÇ pÉÏ UWûÏ Wæû| rÉå qÉÉlÉÉ eÉÉiÉÉ Wæû ÌMü xÉÔU Måü AÍkÉMüÉÇzÉ mÉS mÉëaÉÏiÉÉiqÉMü rÉÉ ÍsÉËUMüsÉ WæÇû|

xÉÔU uÉÉixÉsrÉ AÉæU mÉëåqÉ Måü MüÌuÉ WæÇû| ElÉMüÐ UcÉlÉÉAÉåÇ qÉåÇ eÉWûÉð M×üwhÉ MüÉ oÉcÉmÉlÉ xÉeÉÏuÉ WûÉå EPûiÉÉ Wæû uÉWûÏÇ UÉkÉÉ-M×üwhÉ mÉëåqÉ MüÉ pÉÏ qÉlÉÉåWûU ÍcɧÉhÉ ÍqÉsÉiÉÉ Wæû| xÉÔU MüÉ qÉlÉ aÉÉðuÉÉå qÉåÇ oÉxÉiÉÉ jÉÉ AÉæU ElWûÉåÇlÉå aÉÉðuÉ MüÐ mÉëM×üÌiÉ MüÉ oÉÄQûÉ WûÏ ASèpÉÑiÉ ÍcɧÉhÉ ÌMürÉÉ Wæû|

xÉÔU Måü mÉSÉåÇ qÉåÇ uÉÉixÉsrÉ uÉhÉïlÉ MüÉ AmÉlÉÉ xjÉÉlÉ Wæû ÎeÉxÉMüÉå SåZÉMüU ClÉMåü eÉlqÉÉÇkÉ WûÉålÉå mÉU zÉÇMüÉ WûÉåiÉÏ Wæû|

ESÉ. 1. rÉzÉÉåSÉ WûËU mÉÉsÉlÉå fÉÑsÉÉuÉiÉ|

        WûsÉUÉuÉæ SÒsÉUÉD qÉsWûÉuÉæ eÉÉåC xÉÉåC aÉÉuÉæ||

     2. MüU mÉaÉ aÉÌWû AÆaÉÑPûÉ qÉÑZÉ qÉåsÉiÉ|

     3. WûËU ÌMüsÉMüiÉ eÉxÉÉåSÉ MüÐ MüÌlÉrÉÉ|

 4. xÉÉåÍpÉiÉ MüU lÉuÉlÉÏiÉ ÍsÉL|

     bÉÑOûÂlÉ cÉsÉiÉ UålÉÑ iÉlÉ qÉÇÌQûiÉ qÉÑZÉ SÍkÉ sÉåmÉ ÌMüL||

5. qÉærrÉÉ qÉÉåÌWû SÉF oÉWÒûiÉ ÎZÉeÉÉuÉiÉ

xÉÔU Måü MüÉurÉ qÉåÇ UÉkÉÉ:

oÉÔfÉiÉ zrÉÉqÉ MüÉælÉ iÉÔ aÉÉåUÏ?

MüWûÉð UWûiÉ MüÉMüÐ Wæû oÉåOûÏ, SåZÉÏ lÉÌWÇû MüWÕðû oÉëeÉZÉÉåUÏ|

xÉÔUSÉxÉ MüÐ mÉëqÉÑZÉ UcÉlÉÉLÆ xÉÔUxÉÉaÉU, xÉÔUxÉÉUÉuÉsÉÏ, xÉÉÌWûirÉsÉWûUÏ, pÉëqÉUaÉÏiÉ, lÉsÉ-SqÉrÉliÉÏ, orÉÉWûsÉÉå, xÉÔU-mÉŠÏxÉÏ, aÉÉåuÉkÉïlÉsÉÏsÉÉ , mÉëÉhÉmrÉÉUÏ AÉÌS WæÇû|



CxÉ mÉëMüÉU WûqÉ SåZÉiÉå WæÇû ÌMü xÉÔU Måü MüÉurÉ mÉëåqÉ pÉÌ£ü xÉå AÉåiÉmÉëÉåiÉ WæÇû| M×üwhÉ MüÐ oÉÉsÉsÉÏsÉÉ MüÉ ÍcɧÉhÉ WûÉå rÉÉ UÉxÉsÉÏsÉÉ MüÉ xÉuÉï§É mÉëåqÉ MüÉ WûÏ xÉÉqÉëÉerÉ Wæû| oÉÉsÉ qÉlÉÉåÌuÉ¥ÉÉlÉ MüÐ aÉWûUÏ mÉMüÄQû xÉÔUSÉxÉ MüÉå jÉÏ| ElWûÉåÇlÉå oÉÉsÉ CcNûÉAÉåÇ MüÉ oÉWÒûiÉ MüÐ oÉÉUÏMüÐ xÉå ÍcɧÉhÉ ÌMürÉÉ Wæû| rÉzÉÉåSÉ MüÉ M×üwhÉ mÉëåqÉ WûÉå rÉÉ aÉÉåÌmÉrÉÉåÇ MüÉ xÉpÉÏ MüÉ uÉhÉïlÉ AÉÆZÉåÇ lÉqÉ MüU SålÉå uÉÉsÉÉ Wæû| xÉÔU Måü mÉëM×üÌiÉ ÍcɧÉhÉ xÉå mÉÔUÉ oÉëeÉ ÌlÉZÉU MüU xÉÉqÉlÉå AÉiÉÉ Wæû|

xÉÔUSÉxÉ Måü ÌoÉlÉÉ ÌWûlSÏ MüÉurÉ MüÉ AÎxiÉiuÉ AmÉÔhÉï xÉÉ mÉëiÉÏiÉ WûÉåiÉÉ Wæû|